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निधिवन में शरद पूर्णिमा की रात में कामदेव पर भारी पड़े कृष्ण : मीरा बाई

  • श्रध्दा भक्ति और उल्लास के साथ मनाई गई शरद पूर्णिमा
  • 5 क्विंटल दूध की बनी खीर से हजारों श्रदालु हुए तृप्त
  • श्रदालुओं ने प्राप्त किया चाँदनी रात में खीर का प्रसाद
  • मीरा आश्रम में उमड़ा आस्था का सैलाब
  • शरद पूर्णिमा से हुई शरद ऋतु की शुरुआत
  • मीरा बाई ने कृष्ण रास लीलाओं का किया जिक्र

कपिल शर्मा /गौरवशाली भारत

नाँगल चौधरी। शरद पूर्णिमा के अवसर पर ग्राम भेडन्टी स्थित मीरा आश्रम में विशाल शरद पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन किया गया। करीब पांँच क्विंटल दूध से बनी खीर कृष्ण भोग के लिए तैयार करवाई गई। रविवार मध्य रात्रि चाँदनी में एक हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने शरद पूर्णिमा खीर अमृत भोग का प्रसाद प्राप्त किया। इसके अलावा खीर वितरण का आयोजन देर रात्रि तक जारी रहा। रविवार शाम शरद पूर्णिमा उत्सव श्रद्धा व भक्ति के साथ मनाया गया।

प्रसाद स्वरूप खीर वितरण से पूर्व कृष्ण भक्ति गीतों के साथ विशेष कलाकारों द्वारा जिसमेंं मौजी की ढ़ाणी कोटपूतली से विजय महासी और वहीं नेहड़ा प्रोग्राम प्रस्तुति के लिए गाँव मूसनौता से महेश महासी कलाकार द्वारा संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आश्रम प्रमुख रजनीदास ने की। उनके सानिध्य में सुप्रसिद्ध कथावाचक कृष्णा किशोरी सहित मुख्य अतिथि स्वरूप भरतपुर से पहुंचे विजय सिंह मीणा और विशिष्ट अतिथ स्वरूप सेविका रामेश्वरी, नारायण पुर से पुष्पा देवी, अलवर से मोहिनी देवी, संता देवी और आश्रम संचालक प्रीतमदास द्वारा कार्यक्रम की व्यवस्था और अतिथि आवागमन का दायित्व निर्वहन किया।

मीरा बाई ने भगवान श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का किया वर्णन

इस विशेष शुभ अवसर पर मीरा बाई ने भगवान श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं सहित कृष्ण-रूकमणी के विवाह का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि बृज की गोपियां भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी देवी की आराधना कर रही थी। भगवान ने उनका मनोरथ पूर्ण करने के लिए शरद पूर्णिमा को जब चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं से उदय हुआ, तब वृन्दावन में प्रवेश कर महारास की इच्छा से बांसुरी का वादन किया। बांसुरी की धुन सुनकर गोपियां घर के काम छोड़कर वृंदावन पहुंची। महारास का आयोजन कामदेव पर विजय प्राप्त करने के लिए किया गया था। मीरा बाई ने कहा कि, कामदेव को बड़ा अभिमान था कि मैंने तीनों लोकों में सब पर विजय प्राप्त कर ली। कामदेव ने एक बार भगवान के पास आकर युद्ध करने की इच्छा प्रकट की। तब भगवान ने उससे कहा कि जब मैं अनंत कोटि गोपियों के साथ महारास करूं, तब आकर तुम अपना प्रहार करना। कामदेव ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया। लेकिन, बेअसर रहा। चुंकि, भगवान कृष्ण के महारास में काम की गंध नहीं थी, जिससे कामदेव परास्त हो गया। इसके बाद भगवान कृष्ण मथुरा पहुंचे जहांँ आतताई कंस के अत्याचार को समाप्त करने के लिए कंस का वध किया और महाराज उग्रसेन को जेल से मुक्त किया। मीरा बाई ने कहा कि, हाथी से लेकर चींटी के गले में बंधी घंटी की आवाज भी परमात्मा को सुनाई देती है। उन्होंने आगे कहा कि, चोर-साहूकार पर नज़र और भूखे और गरीब असहाय जरूरतमंद की सुध भी सच्चिदानंद को हर वक्त रहती है।

कृष्ण ने 16 हजार 108 रानियों से किया रास

पुराणों में उल्लेखनीय अनुसार, गोकुल में कृष्ण ने सभी गोपिकाओं के संग एक साथ अनेक रूप धारण कर वृन्दावन के निधिवन में चाँदनी रात में महारास रचाया था। महाभारत के अनुसार श्री कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर उनके साथ विवाह रचाया था। रुक्मणि विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री थी। जो भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी, लेकिन रुक्मणि के अलावा भी कृष्ण की 16 हजार 107 पत्नियां थी।

कृष्ण की कैसे बनी 16 हजार 108 पत्नियाँ

एक दानव भूमासुर ने अमर होने के लिए 16 हजार कन्याओं की बलि देने का निश्चय कर लिया था। श्री कृष्ण ने इन कन्याओं को कारावास से मुक्त कराया और उन्हें वापस घर भेज दिया। इस कहानी का अंत यहीं नहीं हुआ। जब ये कन्याएं घर पहुंचीं तो परिवारवालों ने चरित्र के नाम पर इन्हें अपनाने से इनकार कर दिया। तब श्री कृष्ण ने 16 हजार रूपों में प्रकट होकर एक साथ उनसे विवाह रचाया था। इस विवाह के अलावा श्री कृष्ण ने कुछ प्रेम विवाह भी किए।

कृष्ण ने कालिंदी से किया विवाह

श्रीकृष्ण जब पांडवों से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ पहुंचे तो युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुंती ने उनका आतिथ्‍य-पूजन किया। इस दौरान एक दिन अर्जुन को साथ लेकर भगवान कृष्ण वन विहार के लिए निकले। जिस वन में वे विहार कर रहे थे वहां पर सूर्य पुत्री कालिन्दी, श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया।

कृष्ण की थी 8 प्रमुख पटरानियांँ

कृष्ण की पत्नियों को पटरानियां कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की सिर्फ 8 पत्नियां थी जिनके नाम रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा था।

कृष्ण के थे 1 लाख 61 हजार पुत्र

पुराणों के अनुसार कृष्ण के 1 लाख 61 हजार 80 पुत्र थे और इतना ही नहीं, उनकी सभी स्त्रियों के 10-10 पुत्र और एक-एक पुत्री भी उत्पन्न हुई। इस प्रकार उनके 1 लाख 61 हजार 80 पुत्र और 16 हजार 108 कन्याएं थी। इस प्रकार श्री कृष्ण भारत के सबसे बड़े परिवार के मुखिया बने, जिन्होंने अपने गृहस्थ जीवन के हर धर्म का समुचित पालन किया।

इस शरद पूर्णिमा कार्यक्रम के अवसर पर आश्रम में रविवार शाम से श्रद्धालुओं की भीड़ का जमावड़ा देखा गया। इस दौरान सद् गुरू स्वरूप मीरा आश्रम प्रमुख महंत रजनी दास के सान्निध्य में सुप्रसिद्ध कथावाचक कृष्णा किशोरी सहित प्रीतम दास और विजय सिंह मीणा, रामेश्वरी, पुष्पा देवी, मोहिनी देवी, संता देवी और आश्रम श्रदालु उपस्थित रहे।

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