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आधुनिक बिहार के प्रथम शिल्पकार

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आधुनिक बिहार के प्रथम शिल्पकार बिहार केसरी

प्रो. अरूण कुमार सिंह

पूर्व विश्वविद्यालय आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग रामदयालु सिंह महाविद्यालय,  मुजफ्फरपुर, बिहार

प्रशासन जीवन के साथ जीवन्त हो जाता है, यह लोकतंत्र के संस्पर्श से लोकसम्मत हो जाता है। गौरवशाली बिहार में आजादी के पूर्व, प्रधानमंत्री एवं बाद में मुख्यमंत्री के रूप में बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने अपनी लोकतांत्रिक मनोवृत्ति, समत्वबोध युक्त जीवनशैली, सद्व्यवहार युक्त भावबोध के द्वारा अपनी कीर्ति-पताका फहराने का अदभुत कार्य किया। यों तो उनका जन्म अपने ननिहाल बिहार के नवादा जिले के खनवाँ गाँव में हुआ था, मगर पैतृक गाँव तत्कालीन मुंगेर जिला अन्तर्गत बरबीघा थाना के माऊर गाँव में होने के कारण उनकी जन्मभूमि वहीं मानी गयी। बाबू हरिहर सिंह के चौथे पुत्र के रूप में धरती पर आये डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का लालन-पालन माँ के अभाव में बड़े भाई देवकीनंदन सिंह की पत्नी की देखरेख में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा माऊर गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय से ही प्रारंभ हुयी, लेकिन धर्मपारायण पिता के सानिध्य में बचपन से ही रामचरितमानस के विशेष अनुरागी बन गये। वर्ष 1911 में स्नातक, 1913 में स्नातकोत्तर एवं वर्ष 1915 में लॉ की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद उसी वर्ष मुंगेर स्थित न्यायालय में वकालत करना प्रारंभ किया। पढ़ाई के दौरान ही वे बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, अरविंद घोष जैसे प्रखर राष्ट्रवादियों से प्रभावित हो चूके थे।

तिलक द्वारा सम्पादित ‘मराठा’ और अरविन्द घोष के ‘वन्दे मारतम्’ के वे नियमित पाठक बने रहे। छात्र जीवन में ही वे प्रखर वक्ता बन गये थे। उन्हीं दिनों अपनी वक्तृत्व क्षमता से उन्होंने अपने सहपाठियों को राष्ट्रवाद एवं देश-प्रेम की शिक्षा देना प्रारंभ कर दिया था। 17 दिसम्बर 1921 को असहयोग आन्दोलन के दौरान वे पहली बार गिरफ्तार किये गये एवं न्यायालय द्वारा उन्हें एक वर्ष की सजा दी गयी। जेल यात्रा से उनकी कार्यशैली में और अधिक पैनापन आया। बिहार के प्रधानमंत्री वर्ष 1935 में अंग्रेजों ने भारतीयों को प्रशासन में ज्यादा जगह देने के उद्येश्य से गर्वनमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पारित किया, जिसके अन्तर्गत बिहार विधान सभा हेतु जनवरी, 1937 में चुनाव हुआ। कांग्रेस को सफलता मिली। गवर्नर से कई मामलों में संवैधानिक मतभेद के कारण डॉ. श्रीकृष्ण सिंह मंत्रीमंडल गठन से इनकार करते रहे, अंत में 20 जुलाई 1937 में को वे प्रधानमंत्री तथा अनुग्रह नारायण सिंह, सैयद महमूद और जगलाल चौधरी मंत्री बनाये गये। वर्ष 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेज सरकार की युद्धनीति के विरोध में कांग्रेस के आदेश पर उन्होंने मंत्रीमंडल का इस्तीफा सौंप दिया।

 कर्त्तव्यपालन के दौरान पत्नी की मृत्यु
वर्ष 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में उनकी सक्रियता देखते बनती थी। जेल जाना निश्चित था और गए भी। वर्ष 1944 में गंभीर रूप से बीमार होने के कारण उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। इसी बीच उनकी पत्नी रामरूचि देवी गंभीर बीमारी से ग्रसित होकर पटना मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गयीं। 31 जनवरी, 1944 को जब वे अपनी मरणासन्न पत्नी के पास बैठे थे, उसी समय सरकार का एक फरमान मिला, जिसके अनुसार पटना में उनके द्वारा कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं की जायेगी, इस आशय के शपथ-पत्र पर उन्हें हस्ताक्षर करना था। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का चेहरा तमतमा उठा, उन्होंने इकरारनामे पर दस्तखत करने की जगह धर्मपत्नी को अपने हाथों गंगाजल पिलाया और अस्पताल से निकल गये, उनके जाने के लगभग एक घंटे बाद उनकी धर्मपत्नी इस दुनिया से विदा हो गईं। ऐसा था उनका त्याग। कर्तव्य पथ पर लगातार चलते जाना ही उनके जीवन का उद्येश्य रहा।
2 अप्रैल, 1946 को वे पुन: बिहार के प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने के बाद 1952 के प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। मुंगेर के खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र से वे चुनाव जीते। जनता पर अटूट विश्वास होने के कारण अपनी उम्मीदवारी दाखिल करने के बाद पूरे चुनाव के दौरान कभी भी अपने चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते थे। 1952 में नयी संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत वे बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने। आजादी के तुरंत बाद बिहार देश में तेजी से विकसित होने वाला दूसरा राज्य था। श्री बाबू के शासनकाल के समय संसद से नियुक्त फोर्ड फाउंडेशन के प्रसिद्ध अर्धशास्त्री एप्पेलवी ने अपनी रिर्पोट में बिहार राज्य को देश का सबसे ‘बेहतरीन शासित राज्य’ बताया था।
बिहार का विकास उनकी प्राथमिता थी, उनका ध्येय था। अपने 10 साल के शासनकाल में बरौनी में पहली आयल रिफायनरी, पहला खाद कारखाना, एशिया का सबसे बड़ा इंजिनियरिंग कारखाना (एच.ई.सी.), सबसे बड़ा स्टील प्लांट बोकारो में, सबसे बड़ा रेलवे यार्ड गुड़हरा में स्थापित करने का श्रेय उनको जाता है। उनके शासन काल में प्रदेश में उच्च शिक्षा के सुदृढ़ीकरण हेतु भागलपुर, बिहार एवं राँची में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी।
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को आधुनिक बिहार का निमार्ता कहा जाता है। उनके प्रमुख और प्रिय सहयोगी तथा प्रथम ‘बिहार-विभूति’ अनुग्रहनारायण सिंह ने अपने उद्गार प्रकट करते हुए एक जगह लिखा है- ‘वर्ष 1921 के बाद बिहार का इतिहास श्री बाबू के जीवन का इतिहास है।’
उनके नेतृत्व में बिहार ‘जमींदारी प्रथा’ का उन्मूलन करने वाला देश का प्रथम राज्य बना। दलितों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने हेतु उन्होंने देवघर के पंडों के विरोध के बावजूद स्वयं उनके साथ जाकर देवघर स्थित शिवालय में शिव की पूजा की। अपने कार्यकाल में उन्होंने प्रदेश को नयी उचाईयों तक पहुँचाने का महती कार्य किया, लोगों में भरोसा पैदा किया, उनके दु:ख-दर्द के सहभागी बने और अंत में 31 जनवरी, 1961 को सदा के लिए गहरी नींद में सो गये।
श्रीबाबू ने भले ही अपने प्रदेश बिहार का नेतृत्व किया, लेकिन वे उस काल के किसी भी राष्ट्रीय नेता से कमतर नहीं थे। वे न केवल एक राजनेता थे वरन् एक चिंतक, दार्शनिक, उद्भट विद्धान, युग-निमार्ता एवं युग-द्रष्टा थे। ऐसी प्रखर प्रतिभा और मेधा के धनी स्वतंत्रता सेनानी को भावभीनी श्रद्धांजली प्रेषित है।’’